Thursday, 17 September 2015

 हम नहीं अधूरे...

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भीग कर भी भीगने का एहसास अधूरा सा लगता था,
पर अब ख़ुद में सिमट के भी हम पूरे हैं,
मत सोचना तुम ये कि हम आज भी अधूरे हैं ।।

आंखों में सपने फिर मचलने लगे हैं,
दिल में चाहत के फूल फिर से खिलने लगे हैं,
अब तुम्हारी याद में आंसू नहीं आते,
हम ख़ुद मेंं कुछ यूँ खिलने लगे हैं,
कोई तो है जो हमें चाहता है...
आज इस बारिश में उसके ख़ातिर पिघलने लगे हैं।


ख़ुदा ने बख़्शे हैं जो भी रंग ज़िन्दगी में,
आज हम ख़ुद को उन रंगों में रंगने लगे हैं......
अब तुम्हारे बिन अकेले हंस के चलने लगे हैं,
मत सोचना तुम ये कि हम आज भी अधूरे हैं,
क्योंकि ख़ुद में सिमट के भी हम पूरे हो गये हैं।। ---------- " सुन्दरम् "

मैं, तुम और "मय".... 

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कल रात तूने ही दी थी दस्तक,
खटखटाई तूने मेरे दिल की चौखट,
क्योंकि कल तू उदास था...
हाथों में मय का प्याला था और तू बना देवदास था..
उस मय की आगोश में गिरकर,
तू कल मुझे थामने चला आया था....
टूट कर बिखर जाना चाहता था मेरी आगोश में ...
क्योंकि कल तू नहीं था होश में.....
ग़र मुझे थामने की कीमत ..तेरी वो बेहोशी है, तो मेरे वज़ूद का हुनर क्या है..
मेरे प्यार में मदहोशी नहीं तो इस प्यार की उमर क्या है.....
तू हर रात उस मदिरा की शीशी को होठों से लगाता है,
तो ये दिल छलनी हो जाता है..
पर तू उस शीशी के लिए अपने अपनों से भी लड़ जायेगा...
महीनों-महीनों तक घर भी नहीं जाएगा...
पिता जी की डांट भी तुझे उस शीशी के आगे बेपरवाह लगती है..
उसके लिए तू रोज़ दुनिया के सामने झोली फैलाएगा..
मुझसे ज़्यादा ख़ुशनसीब तो वो कमबख़्त बेहोशी की बोतल है..
जिसके लिए तू दुनिया से दूर एकांत में जाता है..
उसे थाम कर हाथों में ..
उसकी आगोश में खो जाता है....
जब वो तेरी हलक़ से उतर जाती है...
तब तुझे मेरी याद आती है...
दिखता है तुझे वो बिछौना,जहां मैं नहीं , मेरी यादें नज़र आती हैं..
काश मैं वो बेहोशी की शीशी ही होती..
तो तू मुझे ख़ुद से जुदा न करता..
हर बार जब भी उठाता..
होठों से लगाता..
उतर जाती मैं हलक़ से...
और तू मेरी आगोश में खो जाता....न दुनिया की सुध होती तुझे न होता होश,
मेरे ही नशे में तू पड़ा होता बेहोश...
कहलाती मैं तेरी ही मदिरा...
और तू मेरा मधुपुरूष बन जाता.....!!


- 'सुन्दरम्'
[डिस्कलेमर- बाबा के भक्त इसे उनका गुणगान न समझें, किसकी वयक्ति विशेष की प्रशंसा मेें लिखा गया काव्य नहीं है, फिर भी लोग अपनी मानसिक पृष्ठभूमि के आधार पर इसकी व्याख्या कर ही लेंगे....आप 19 (1) A का आनंद उठाने हेतु स्वतंत्र है ....पर हम कर्तव्यों की याद दिलाते रहेंगे...माइक, लेखनी या चैनल का दामन थामे हैं तो सिक्के के दोनों पहलुओं पर ध्यान अवश्य दीजियेगा । धन्यवाद ! ]

आलोचना के पथ पर....

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महापुरूष जो सत्य में होते,
प्रगति पथ पर जो बढ़े निरंतर,
गूंजे जिनके शब्द दिगंतर.....
उन्हें कहाँ भय छू पाता है....
होते वो अग्रसर,
आलोचना के पथ पर.....

ना उनका विश्वास डिगे है,
ना उनकी कोई श्वाँस डिगे है,
नभ बरसे या चपला कौंधे...
उनका विश्वास असत्य को रौंदे,
हाहाकार घेरे तम जैसा...
अन्ध भक्त मस्तक पर छाते,
व्यर्थ का गर्जन भर कर लाते,
अपनी-अपनी बस मनवाते,
फिर भी अकेले वो चलते हैं,
मन में अदम्य सा साहस भर कर...

नहीं चाहिये उन्हें चेल-चपाटे....
वो समर्थ हैं , जीवन पथ पर....
वही निडर हैं, वही समर हैं...
चलते जो आलोचना के पथ पर...

- " सुन्दरम् "

बेताबी 

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बेताबी तुझसे मिलने की, जीने भी नहीं देती,मरने भी नहीं देती
बेताबी तुझे पाने की खोने भी नहीं देती, पाने भी नहीं देती,
बेताबी तुझ तक पहुँचने की, दिन-रात मांगती है मेरा ख़ून-पसीना,
थक हार कर मुझे गिरने भी नहीं देती, थमने भी नहीं देती,
बेताबी मंज़िल तक पहुँचने की ,रूकने भी नहीं देती,झुकने भी नहीं देती,
दिल में आग जल रही है, हिम्मत की,
मुझे मार पड़ रही है , क़िस्मत की,
तुझे पाने की चाह , आह भरने भी नहीं देती,
सिसकियां ले -ले कर, सांसे भरती हूँ,
बेताबी मगर ये मेरी, सांस थमने भी नहीं देती ।
बेताबी तुझसे मिलने की, जीने भी नहीं देती,मरने भी नहीं देती ।। 


- "सुन्दरम्"