[डिस्कलेमर- बाबा के भक्त इसे उनका गुणगान न समझें, किसकी वयक्ति विशेष
की प्रशंसा मेें लिखा गया काव्य नहीं है, फिर भी लोग अपनी मानसिक पृष्ठभूमि
के आधार पर इसकी व्याख्या कर ही लेंगे....आप 19 (1) A का आनंद उठाने हेतु
स्वतंत्र है ....पर हम कर्तव्यों की याद दिलाते रहेंगे...माइक, लेखनी या
चैनल का दामन थामे हैं तो सिक्के के दोनों पहलुओं पर ध्यान अवश्य दीजियेगा ।
धन्यवाद ! ]
आलोचना के पथ पर....
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महापुरूष जो सत्य में होते,
प्रगति पथ पर जो बढ़े निरंतर,
गूंजे जिनके शब्द दिगंतर.....
उन्हें कहाँ भय छू पाता है....
होते वो अग्रसर,
आलोचना के पथ पर.....
ना उनका विश्वास डिगे है,
ना उनकी कोई श्वाँस डिगे है,
नभ बरसे या चपला कौंधे...
उनका विश्वास असत्य को रौंदे,
हाहाकार घेरे तम जैसा...
अन्ध भक्त मस्तक पर छाते,
व्यर्थ का गर्जन भर कर लाते,
अपनी-अपनी बस मनवाते,
फिर भी अकेले वो चलते हैं,
मन में अदम्य सा साहस भर कर...
नहीं चाहिये उन्हें चेल-चपाटे....
वो समर्थ हैं , जीवन पथ पर....
वही निडर हैं, वही समर हैं...
चलते जो आलोचना के पथ पर...
- " सुन्दरम् "
प्रगति पथ पर जो बढ़े निरंतर,
गूंजे जिनके शब्द दिगंतर.....
उन्हें कहाँ भय छू पाता है....
होते वो अग्रसर,
आलोचना के पथ पर.....
ना उनका विश्वास डिगे है,
ना उनकी कोई श्वाँस डिगे है,
नभ बरसे या चपला कौंधे...
उनका विश्वास असत्य को रौंदे,
हाहाकार घेरे तम जैसा...
अन्ध भक्त मस्तक पर छाते,
व्यर्थ का गर्जन भर कर लाते,
अपनी-अपनी बस मनवाते,
फिर भी अकेले वो चलते हैं,
मन में अदम्य सा साहस भर कर...
नहीं चाहिये उन्हें चेल-चपाटे....
वो समर्थ हैं , जीवन पथ पर....
वही निडर हैं, वही समर हैं...
चलते जो आलोचना के पथ पर...
- " सुन्दरम् "
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