मैं, तुम और "मय"....
*****************कल रात तूने ही दी थी दस्तक,
खटखटाई तूने मेरे दिल की चौखट,
क्योंकि कल तू उदास था...
हाथों में मय का प्याला था और तू बना देवदास था..
उस मय की आगोश में गिरकर,
तू कल मुझे थामने चला आया था....
टूट कर बिखर जाना चाहता था मेरी आगोश में ...
क्योंकि कल तू नहीं था होश में.....
ग़र मुझे थामने की कीमत ..तेरी वो बेहोशी है, तो मेरे वज़ूद का हुनर क्या है..
मेरे प्यार में मदहोशी नहीं तो इस प्यार की उमर क्या है.....
तू हर रात उस मदिरा की शीशी को होठों से लगाता है,
तो ये दिल छलनी हो जाता है..
पर तू उस शीशी के लिए अपने अपनों से भी लड़ जायेगा...
महीनों-महीनों तक घर भी नहीं जाएगा...
पिता जी की डांट भी तुझे उस शीशी के आगे बेपरवाह लगती है..
उसके लिए तू रोज़ दुनिया के सामने झोली फैलाएगा..
मुझसे ज़्यादा ख़ुशनसीब तो वो कमबख़्त बेहोशी की बोतल है..
जिसके लिए तू दुनिया से दूर एकांत में जाता है..
उसे थाम कर हाथों में ..
उसकी आगोश में खो जाता है....
जब वो तेरी हलक़ से उतर जाती है...
तब तुझे मेरी याद आती है...
दिखता है तुझे वो बिछौना,जहां मैं नहीं , मेरी यादें नज़र आती हैं..
काश मैं वो बेहोशी की शीशी ही होती..
तो तू मुझे ख़ुद से जुदा न करता..
हर बार जब भी उठाता..
होठों से लगाता..
उतर जाती मैं हलक़ से...
और तू मेरी आगोश में खो जाता....न दुनिया की सुध होती तुझे न होता होश,
मेरे ही नशे में तू पड़ा होता बेहोश...
कहलाती मैं तेरी ही मदिरा...
और तू मेरा मधुपुरूष बन जाता.....!!
- 'सुन्दरम्'
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